NCERT Class 8 Hindi (Vasant Bhag 3) Solutions
Chapter 4: भगवान के डाकिए (Bhagwaan_ke_Daakiye)
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NCERT Class 8th Hindi Chapter 4 हरिद्वार Question Answer
हरिद्वार Class 8 Question Answer
कक्षा 8 हिंदी पाठ 4 प्रश्न उत्तर – Class 8 Hindi हरिद्वार Question Answer
पाठ से प्रश्न- अभ्यास
(पृष्ठ 49-58)
आइए, अब हम इस पत्र को थोड़ा और विस्तार से समझते हैं। नीचे दी गई गतिविधियाँ इस कार्य में आपकी सहायता करेंगी।
मेरी समझ से
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा (*) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।
प्रश्न-
“ सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं” का क्या अर्थ है?
(क) लेखक के अनुसार सज्जन लोग बिना पूछे स्वादिष्ट रसीले फल देते हैं।
(ख) लेखक फलदार वृक्षों की उदारता को मानवीय रूप में व्यक्त कर रहे हैं।
(ग) लेखक का मानना था कि हरिद्वार के सभी दुकानदार बहुत सज्जन थे।
(घ) लेखक को पत्थर मारकर पके हुए फल तोड़कर खाना पसंद था।
उत्तर:
(ग) लेखक का मानना था कि हरिद्वार के सभी दुकानदार बहुत सज्जन थे।
“ वैराग्य और भक्ति का उदय होता था” इस कथन से लेखक का कौन-सा भाव प्रकट होता है?
(क) शारीरिक थकान और मानसिक बेचैनी
(ख) आर्थिक संतोष और मानसिक विकास
(ग) मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव
(घ) सामाजिक सद्भाव और पारिवारिक प्रेम
उत्तर:
(ग) मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव

“पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल से बढ़कर था” इस वाक्य का सर्वाधिक उपयुक्त निष्कर्ष क्या है?
(क) संतुष्टि में सुख होता है।
(ख) सुखी लोग पत्थर पर भोजन करते हैं।
(ग) लेखक के पास सोने की थाली नहीं थी।
(घ) पत्थर पर रखा भोजन अधिक स्वादिष्ट होता है।
उत्तर:
(क) संतुष्टि में सुख होता है।
“एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया।” यह प्रसंग किस मूल्य को बढ़ावा देता है ?
(क) अंधविश्वास और लालच
(ख) मानवता और देशप्रेम
(ग) सादगी और आत्मनिर्भरता
(घ) स्वच्छता और प्रकृति प्रेम
उत्तर:
(घ) स्वच्छता और प्रकृति प्रेम
लेखक का हरिद्वार अनुभव मुख्यतः किस प्रकार का था?
(क) राजनीतिक
(ख) आध्यात्मिक
(ग) सामाजिक
(घ) प्राकृतिक
उत्तर:
(ख) आध्यात्मिक
(घ) प्राकृतिक

पत्र की भाषा का एक मुख्य लक्षण क्या है?
(क) कठिन शब्दों का प्रयोग और बोझिलता
(ख) मुहावरों का अधिक प्रयोग
(ग) सरलता और चित्रात्मकता
(घ) जटिलता और संक्षिप्तता
उत्तर:
(ग) सरलता और चित्रात्मकता
(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुनें?
उत्तर:
विद्यार्थी स्वयं करें।
मिलकर करें मिलान
पाठ से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। आपस में चर्चा कीजिए और इनके उपयुक्त संदर्भों से इनका मिलान कीजिए-
उत्तर:

शब्द | संदर्भ |
Question 1 (1)
हरिद्वार | 3. यह भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित एक प्रसिद्ध तीर्थस्थान है। यहाँ से गंगा पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है। |
2. गंगा | 5. यह भारतवर्ष की एक प्रधान नदी है जो हिमालय से निकलकर लगभग 1560 मील पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसके अनेक नाम हैं, जैसे- भागीरथी, त्रिपथगा, अलकनंदा, मंदाकिनी, सुरनदी आदि। |
3. भगीरथ | 6. ये अयोध्या के प्रसिद्ध सूर्यवंशी राजा थे। कहा जाता है कि ये घोर तपस्या करके गंगा को पृथ्वी पर लाए थे। इसीलिए गंगा का एक नाम ‘भागीरथी’ भी है। |
4. चण्डिका | 1. मान्यताओं के अनुसार दुर्गा का एक रूप। |
5. भागवत | 2. यह अठारह पुराणों में से सर्वप्रसिद्ध एक पुराण है। इसमें अधिकांश श्री कृष्ण संबंधी कथाएँ हैं। |
6. दालचीनी | 4. यह एक पेड़ का नाम है। यह दक्षिण भारत में बहुतायत से मिलता है। इस पेड़ की सुगंधित छाल दवा और मसाले के काम में आती है। इसे दारचीनी भी कहते हैं। |
मिलकर करें चयन
(क) पाठ से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दिए गए हैं। प्रत्येक वाक्य के सामने दो-दो निष्कर्ष दिए गए हैं – एक सही और एक भ्रामक। अपने समूह में इन पर विचार कीजिए और उपयुक्त निष्कर्ष पर सही का चिह्न लगाइए।

पंक्ति | निष्कर्ष |
Question 2 (1)
पर्वतों पर अनेक प्रकार की वल्ली हरी-भरी सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैलकर लह- लहा रही है। | लताओं का फैलना सज्जनों की शुभ इच्छाओं की तरह सौम्यता और सुंदरता को दर्शाता है। (✓) |
2. बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं। और साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं। | वृक्षों की स्थिति साधुओं जैसी है जो हर मौसम को सहने के लिए विवश हैं। |
3. इन वृक्षों पर अनेक रंग के पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दुष्ट बधिकों से निडर होकर कल्लोल करते हैं। | यहाँ के पक्षी प्रकृति में सुरक्षित अनुभव करते हैं, इसलिए वे निडर होकर कल्लोल करते हैं। (✓) |
4. जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मिष्ट भी वैसा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है। | गंगाजल की ठंडक और मिठास का अनुभव बहुत मनोहारी है। (✓) |
5. एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया। | लेखक ने भोजन इसलिए बनाया क्योंकि गंगा का पानी बहुत गरम था और वह पकाने में सहायक था। |
6. निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा। | लेखक चाहता है कि पत्र को महत्त्व देकर कहीं स्थान दिया जाए, यानी इसे पढ़ा और सँजोया जाए। (✓) |
पंक्तियों पर चर्चा
पाठ से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपने समूह में साझा कीजिए और लिखिए-

(क) “यहाँ की कुशा सबसे विलक्षण होती है जिसमें से दालचीनी, जावित्री इत्यादि की अच्छी सुगंध आती है। मानो यह प्रत्यक्ष प्रगट होता है कि यह ऐसी पुण्यभूमि है कि यहाँ की घास भी ऐसी सुगंधमय है।”
लेखक यह कहना चाहते हैं कि यह सुगंध इतनी अद्भुत और स्पष्ट है कि ऐसा लगता है मानो यह सीधे-सीधे यह प्रकट कर रही हो कि यह जगह कोई साधारण भूमि नहीं बल्कि एक पवित्र और पुण्यमयी भूमि है। इतनी पवित्र कि यहाँ की सामान्य घास में भी इतनी दिव्य सुगंध है।
(ख) “अहा! इनके जन्म भी धन्य हैं जिनसे अर्थी विमुख जाते ही नहीं। फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं।’
उत्तर:
ये पंक्तियाँ वृक्षों की महिमा का वर्णन करती हैं। लेखक कहता है कि इनका जन्म धन्य है जिससे याचना करने वाले कभी खाली हाथ वापस नहीं जाते हैं। वृक्ष हमें फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़ प्रदान तो करते ही हैं साथ ही जलने के बाद इनसे बने कोयले और राख (भस्म) भी हमारे मनोरथ को पूरा करते हैं। प्रस्तुत पंक्तियों में वृक्षों की परोपकारिता साफ-साफ झलकती हैं।
सोच-विचार के लिए

पाठ को पुनः ध्यान से पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए।
(क) “ और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ ……..”
लेखक का यह वाक्य क्या दर्शाता है ? क्या आपने कभी किसी स्थान को छोड़कर ऐसा अनुभव किया है? कब-कब?
(संकेत – किसी स्थान से लौटने के बाद भी उसी के विषय में सोचते रहना)
उत्तर:
यह वाक्य लेखक की गहरी भावनात्मक जुड़ाव और हरिद्वार के प्रति उनके लगाव को दर्शाता है। पंक्ति का अर्थ है कि लेखक शारीरिक रूप से भले ही कहीं और हों, लेकिन उनका मन, उनकी भावनाएँ और उनकी चेतना अभी भी हरिद्वार की पावन और सुगंधमय भूमि में ही बसी हुई हैं। हाँ, मैंने भी किसी स्थान को छोड़कर ऐसा ही अनुभव किया है। एक बार मैं ऋषिकेश गया था।
वहाँ की प्राकृतिक छटा को देखकर मैं आत्मविभोर हो गया। जब मैं वापस घर लौटा तो मेरा मन नहीं लग रहा था। मेरे दिमाग से ऋषिकेश की प्राकृतिक सुंदरता का चित्र निकलता ही नहीं था। ऐसा लगता था मानो मेरा शरीर ही घर पर है और मन ऋषिकेश में। मैं जब- जब घर से बाहर किसी रमणीक जगह पर घूमने गया तब-तब वापस आने के बाद ऐसा अनुभव होता रहा।
(ख) “पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं। एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं।”
लेखक का यह कथन आज के समाज में कितना सच है? क्या अब भी ऐसे संतोषी लोग मिलते हैं? अपने विचार उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर:
आज के समाज में यह कथन आंशिक रूप से सच है। कुछ लोग वाकई में सादा जीवन, संतोष और आध्यात्मिकता में विश्वास रखते हैं, लेकिन बहुत बार संतोष का दिखावा किया जाता है। पहाड़ों या गाँव में रहने वाले कई शिक्षक, किसान या साधु कम संसाधनों में भी खुश रहते हैं, लेकिन कई बार पंडे नाम मात्र की दक्षिणा मिलने पर भी ऊपर से संतोष प्रकट करते हैं, पर मन में असंतोष रखते हैं।
(ग) “मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका था। यह स्थान भी उस क्षेत्र में टिकने योग्य ही है।”
आपके विचार से लेखक ने उस स्थान को ‘टिकने योग्य’ क्यों कहा है? उस स्थान में कौन-कौन सी विशेषताएँ होंगी जो उसे ‘टिकने योग्य’ बनाती होंगी? (संकेत – केवल आराम, सुविधा या कोई और कारण भी।)
उत्तर:
लेखक ने दीवान कृपा राम के बंगले को ‘टिकने योग्य’ इसलिए कहा है कि उसका बंगला हरिद्वार में था। हरिद्वार जैसे धार्मिक और प्राकृतिक स्थल में स्थित होने के कारण बंगले का वातवरण शांतिपूर्ण और मन को सुकून देने वाला था।
विशेषताएँ-
दीवान कृपा राम का बंगला हरिद्वार में था। हरिद्वार एक प्रमुख तीर्थस्थल है। यहाँ गंगा नदी बहती है और अनेक धार्मिक गतिविधियाँ होती रहती हैं। साथ ही हरिद्वार की प्राकृतिक सुंदरता बरबस लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लेती है। इन सारी विशेषताओं के कारण दीवान कृपा राम के बंगले को लेखक ने ‘टिकने योग्य’ बताया है।
(घ) “फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं।’
इस वाक्य के माध्यम से आपको वृक्षों के महत्त्व के बारे में कौन-कौन सी बातें सूझ रही हैं?
उत्तर:
प्रस्तुत वाक्य के माध्यम से हमें वृक्षों के महत्त्व के बारे में निम्नलिखित बातें सूझ रही हैं-
- संपूर्ण जीवन उपयोगी – वृक्ष का हर अंग जैसे- फल, फूल, पत्ते, बीज, लकड़ी, जड़, छाल आदि मनुष्य के लिए किसी न किसी रूप में उपयोगी होता है।
- जलने के बाद भी उपयोगी – जब वृक्ष जलता है तब भी उसकी राख (भस्म) और कोयले लोगों के काम आते हैं।
- पर्यावरण और सुखद वातावरण प्रदान करना-वृक्ष, छाया और गंध से भी लोगों को सुख देते हैं।
- त्याग और परोपकार का प्रतीक – वृक्ष बिना किसी स्वार्थ के दूसरों के लिए फल-फूल देते हैं।
अनुमान और कल्पना से
(क) “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है। कल्पना कीजिए कि आप हरिद्वार में हैं। आप वहाँ क्या-क्या करना चाहेंगे?
उत्तर:
मैं हरिद्वार में निम्नलिखित कार्य करना चाहूँगा-
- गंगा स्नान करना – हर की पैड़ी पर सुबह- सुबह पवित्र गंगा नदी में स्नान करूँगा। ऐसा माना जाता है कि इसमें आत्मा शुद्ध होती है और पापों से मुक्ति मिलती है।
- गंगा आरती में भाग लेना-शाम के समय हर की पैड़ी पर होने वाली भव्य गंगा आरती में भाग लेना एक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव होता है। दीपों की रोशनी और मंत्रों की ध्वनि मन को शांति देती है।
- मंदिर दर्शन
मनसा देवी मंदिर और चंडी देवी मंदिर की यात्रा करूँगा। ये मंदिर पहाड़ियों पर स्थित हैं, जहाँ जाने के लिए रोपवे या पैदल रास्ता होता है।
भरत माता मंदिर दक्षेश्वर महादेव मंदिर आदि भी देखना चाहूँगा। - स्थानीय व्यंजन चखना – हरिद्वार के प्रसिद्ध शुद्ध शाकाहारी भोजन जैसे – कचौड़ी, जलेबी, आलू-पूड़ी और रबड़ी का स्वाद लेना चाहूँगा।
- स्थानीय बाज़ार घूमना – हरिद्वार के बाज़ारों से रुद्राक्ष, पूजा सामग्री, गंगाजल की बोतलें और हस्तशिल्प खरीदना चाहूँगा।
- आश्रमों का भ्रमण – शांति और साधना के लिए शांति कुञ्ज और पतंजलि योगपीठ जैसे आश्रमों का भ्रमण करूँगा।
- गंगा किनारे बैठकर समय बिताना – गंगा किनारे बैठकर बहते जल की आवाज़ और ठंडी हवा का आनंद लेना एक अलौकिक अनुभव होता है।

(ख) “जल के छलके पास ही ठंढे-ठंढे आते थे। ” कल्पना कीजिए कि आप गंगा के तट पर हैं और पानी के छींटे आपके मुँह पर आ रहे हैं। अपने अनुभवों को अपनी कल्पना से लिखिए।
उत्तर:
मैं गंगा तट पर हूँ। सूरज की सुनहरी किरणें गंगा के जल पर पड़कर उसे स्वर्णिम बना रही हैं। मैं गंगा तट पर बैठा हूँ और सामने से आती ठंडी हवाएँ मेरे चेहरे को छू रही हैं। पानी की लहरें किनारे से टकरा रही हैं और उनके हल्के छींटे मेरे मुख पर पड़ रहे हैं – जैसे माँ गंगा स्वयं मुझे आशीर्वाद दे रही हों।
उन छींटों में एक अद्भुत ठंडक है, जो केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि आत्मा को भी शीतल कर रही हैं। ऐसा लग रहा है जैसे मन की सारी उलझनें, सारे दुःख, इस पवित्र जल में बहते जा रहे हैं। भीड़ के बीच भी मैं स्वयं को अकेला अनुभव कर रहा हूँ – शांत, स्थिर और भीतर तक स्पर्शित।
(ग) “सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।”
यदि पेड़-पौधे सच में मनुष्यों की तरह व्यवहार करने लगें तो क्या होगा ?
उत्तर:
यदि पेड़-पौधे सच में मनुष्यों की तरह व्यवहार करने लगे तो निम्नलिखित बातें हो सकती हैं-
- वे हमसे बात करेंगे। शिकायत करेंगे कि हमने उन्हें बिना वजह क्यों काटा।
- वे अपने दुःख-दर्द, इच्छाएँ और भावनाएँ व्यक्त करेंगे।
- फल देने से पहले कहेंगे – “ पहले पानी दो, फिर फल लो।”
- हर पेड़ का एक ‘परिवार’ होगा – माँ – पेड़, बच्चा-पौधा, दादा-वृक्ष।
- जंगलों में पंचायतें होंगी, फैसले लिए जाएँगे कि कौन पेड़ कहाँ उगेगा या किसको कितनी धूप – पानी चाहिए।
- घरों के गमले में रहने वाले पौधे कहेंगे कि हमें खुले मैदान में रहना है, तंग गमले में नहीं। वे माली से कहेंगे कि हमें रोज़ पानी चाहिए।
- वे मनुष्यों से कहेंगे कि हम ऑक्सीजन देते हैं, बदले में हमारी रक्षा करो।

(घ) “यहाँ पर श्री गंगा जी दो धारा हो गई हैं – एक का नाम नील धारा, दूसरी श्री गंगा जी ही के नाम से।
इस पाठ में ‘गंगा’ शब्द के साथ ‘श्री’ और ‘जी’ लगाया गया है। आपके अनुसार उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा ?
उत्तर:
“गंगा” शब्द के साथ ‘श्री’ और ‘जी’ लगाने का उद्देश्य सम्मान, श्रद्धा और पूज्यता प्रकट करना है। लेखक ने ऐसा निम्न कारणों से किया होगा-
- गंगा को देवी रूप में माना जाता है।
- श्रद्धा की भावना व्यक्त करने हेतु।
- भाषा की मर्यादा और भावनात्मक जुड़ाव बताने हेतु।
- शुद्ध और भक्ति से युक्त शैली |
(ङ) कल्पना कीजिए कि आप हरिद्वार एक श्रवणबाधित या दृष्टिबाधित व्यक्ति के साथ गए हैं। उसकी यात्रा को अच्छा बनाने के लिए कुछ सुझाव दीजिए।
उत्तर:
श्रवणबाधित (सुनने में असमर्थ) व्यक्ति के साथ यात्रा के सुझाव –
- संकेतों और लिखित संचार का उपयोग करें-
आवश्यक सूचनाएँ जैसे – आरती का समय, दर्शन – स्थल, भोजन व्यवस्था लिखकर दें।
सांकेतिक भाषा का प्रयोग करें या मोबाइल ऐप की मदद लें। - दृष्टिगत सूचनाओं का महत्त्व बढ़ाएँ-
संकेत चिह्न आदि की मदद से स्थान की जानकारी दें।
किसी भी धार्मिक स्थल या स्थान के इतिहास को लिखित में दिखाएँ। - सुरक्षा का ध्यान रखें-
भीड़-भाड़ वाले स्थानों में उन्हें साथ रखें ताकि वे दिशा भ्रम न हो जाएँ।
आपात स्थिति के लिए संपर्क विवरण एक कार्ड में लिखकर उनकी जेब में रखें।
* दृष्टिबाधित ( देखने में असमर्थ ) व्यक्ति के साथ यात्रा के सुझाव-
- साथ-साथ चलने की योजना बनाएँ-
उन्हें हाथ पकड़कर या कंधे पर हाथ रखवाकर सावधानी से चलाएँ, खासकर सीढ़ियों, घाटों और भीड़-भाड़ वाले क्षेत्रों में। - क्षव्य अनुभव को प्रोत्साहित करें-
गंगा की लहरों की आवाज़, मंदिरों की घंटियाँ, आरती का संगीत – इनका वर्णन करें, उन्हें सुनने के लिए प्रेरित करें। - वर्णनात्मक भाषा का प्रयोग करें-
“यहाँ गंगा का जल ठंडा है, हल्की हवा चल रही है, फूलों की खुशबू आ रही है …” जैसे विवरण देकर उन्हें वातावरण का अनुभव कराएँ। - स्पर्श के अनुभव को शामिल करें-
मंदिर की दीवारें, घंटियाँ, जल, फूल – इन्हें छूने दें ताकि वे भावनात्मक रूप से जुड़ सकें।
लिखें संवाद
(क) “मेरे संग कल्लू जी मित्र भी परमानंदी थे।” लेखक और कल्लू जी के बीच हरिद्वार यात्रा पर एक काल्पनिक संवाद लिखिए।
उत्तर:
विद्यार्थी स्वयं करें।
(ख) “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है।
लेखक और प्रकृति के बीच एक कल्पनात्मक संवाद तैयार कीजिए- जैसे पर्वत बोल रहे हों।
उत्तर:
विद्यार्थी स्वयं करें।

‘है’ और ‘हैं’ का उपयोग
इन वाक्यों में रेखांकित शब्दों के प्रयोग पर ध्यान दीजिए-
- विशेष आश्चर्य का विषय यह है कि यहाँ केवल गंगा जी ही देवता हैं, दूसरा देवता नहीं।
- यों तो वैरागियों ने मठ मंदिर कई बना लिए हैं। आप जानते ही हैं कि एकवचन संज्ञा शब्दों के साथ ‘है’ का प्रयोग किया जाता है और बहुवचन संज्ञा शब्दों के साथ ‘हैं’ का। सोचिए, ‘गंगा’ शब्द एकवचन है, फिर भी इसके साथ ‘हैं’ क्यों लिखा गया है?

इसका कारण यह है कि कभी-कभी हम आदर-सम्मान प्रदर्शित करने के लिए एकवचन संज्ञा शब्दों को भी बहुवचन के रूप में प्रयोग करते हैं। इसे ‘आदरार्थ बहुवचन’ प्रयोग कहते हैं। उदाहरण के लिए–
- मेरे पिता जी सो रहे हैं।
- भारत के प्रधानमंत्री भाषण दे रहे हैं।
अब ‘आदरार्थ बहुवचन’ को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त शब्दों से रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-
प्रधानाचार्य जी विद्यालय में नहीं ………… वे अभी सभा में उपस्थित ……….।
उत्तर:
हैं, हैं
माता – पिता हमारे जीवन के मार्गदर्शक होते ………., हमें उनका कहना मानना चाहिए।
उत्तर:
हैं
मेरी बहन बाज़ार जा रही ………….. वहाँ से किताबें ले आएगी।
उत्तर:
है
बाहर फेरीवाला ……….. ………… …………. बुला लाओ।
उत्तर:
जा रहा है, उसे
डाकिया जी आए ………। उन्हें भी बुला लाओ।
उत्तर:
हैं
आप तो बहुत दिन बाद ………….., ……….. का स्वागत है।
उत्तर:
आए हैं,
डॉक्टर साहब बहुत विद्वान ………….., …………… से परामर्श लेना चाहिए।
उत्तर:
हैं, उन
आपके माता-पिता कहाँ …………? क्या मैं ………. से मिल सकता हूँ?
उत्तर:
हैं, उन
ये हमारे हिंदी के अध्यापक ……….. हम ………. से बहुत-कुछ सीखते-समझते हैं।
उत्तर:
हैं, उन
बंदर पेड़ पर उछल-कूद कर ……… ………।
उत्तर:
रहा है
भावों की पहचान
प्रेम, संतोष, भक्ति, श्रद्धा, वैराग्य, आश्चर्य
करुणा, हास्य, शांति, परोपकार, दया, दुःख
नीचे कुछ पंक्तियाँ दी गई हैं। सोचिए कि इनमें कौन-सा भाव प्रकट हो रहा है? पहचानिए और चुनकर लिखिए-
उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।
उत्तर:
संतोषी, प्रेम
चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था।
उत्तर:
श्रद्धा, भक्ति
पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं।
उत्तर:
हास्य, आश्चर्य

हर तरफ पवित्रता और प्रसन्नता बिखरी हुई थी।
उत्तर:
शांति, करुणा
सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।
उत्तर:
परोपकार, दया
काल की पहचान
“यहाँ हरि की पैड़ी नामक एक पक्का घाट है और यहीं स्नान भी होता है।’
आप जानते ही होंगे कि काल के तीन भेद होते हैं- :- भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्य काल। परस्पर चर्चा करके पता लगाइए कि ऊपर दिए गए वाक्य में कौन-सा काल प्रदर्शित हो रहा है? सही पहचाना, यह वाक्य वर्तमान काल को प्रदर्शित कर रहा है।
(क) नीचे दी गई पाठ की इन पंक्तियों को पढ़कर बताइए, इनमें क्रिया कौन-से काल को प्रदर्शित कर रही है ? (भूतकाल / वर्तमान / भविष्य)
निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा। ………………….
उत्तर:
भविष्य काल
यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है। ………………….
उत्तर:
वर्तमान काल
वृक्ष ऐसे हैं कि पत्थर मारने से फल देते हैं। ………………….
उत्तर:
वर्तमान काल
चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था। ………………….
उत्तर:
भूतकाल
मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका था। ………………….
उत्तर:
भूतकाल
(ख) अब इन वाक्यों के काल को अन्य कालों में बदलकर लिखिए और नए वाक्य बनाइए।
उत्तर:
- वर्तमान काल
निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दे रहे हैं।
भूतकाल
निश्चय था कि आपने इस पत्र को स्थानदान दिया। - भूतकाल
यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी थी।
भविष्य काल
यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी होगी। - भूतकाल
वृक्ष ऐसे थे कि पत्थर मारने से फल देते थे।
भविष्य काल
वृक्ष ऐसे होंगे कि पत्थर मारने से फल देंगे। - वर्तमान काल
चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता है।
भविष्य काल
चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होगा। - वर्तमान काल
मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले में टिका हूँ।
भविष्य काल
मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले में टिकूँगा।
पत्र की रचना

“और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ……….”
इस पंक्ति में लेखक संपादक महोदय को संबोधित करके अपनी बात लिख रहे हैं। आप जानते ही होंगे कि पत्र जिस व्यक्ति के लिए लिखा जाता है, उसे संबोधित किया जाता है। पत्र के अंत में अपना नाम लिखा जाता है ताकि पत्र पाने वाले को पता चल सके कि पत्र किसने लिखा है।
नीचे इस पत्र की कुछ विशेषताएँ दी गईं हैं। अपने समूह के साथ मिलकर इन विशेषताओं से जुड़े वाक्यों से इनका मिलान कीजिए-
आप एक विशेषता को एक से अधिक वाक्यों से भी जोड़ सकते हैं।
उत्तर:

पत्र की विशेषताएँ | पत्र से उदाहरण |
Question 3 (1)
व्यक्तिपरकता-पत्र लेखन में लेखक के विचार, अनुभव और भावनाएँ प्रमुख होते हैं। | हरिद्वार की प्राकृतिक सुंदरता, धार्मिकता, साधु-संन्यासियों का जीवन, नदी, पर्वत, जल, गंगा स्नान आदि का अत्यंत विस्तार से वर्णन | |
2. संवादात्मकता-पत्र का रूप है; पाठक से सीधा संवाद होता है। | और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ… |
3. स्वाभाविक शैली-भाषा कृत्रिम नहीं होती; भावनाओं के अनुरूप होती है। | “ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया …” |
4. व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन-जहाँ लेखक अपने वास्तविक अनुभव को साझा करता है। | एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके …….. |
5. अभिवादन या संबोधन – पत्र का आरंभ, जिसमें संबोधित व्यक्ति को आदरपूर्वक संबोधित किया जाता है। | श्रीमान कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवरेषु ! |
6. हस्ताक्षर – लेखक अपने नाम या संबंध से पत्र को समाप्त करता है। | आपका मित्र – यात्री |
7. उपसंहार और निवेदन – लेखक पत्र समाप्त करता है | और अपनी इच्छा या निवेदन प्रकट करता है। | और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ… निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा। |
8. मुख्य विषय-वस्तु | मुझे हरिद्वार का समाचार लिखने में बड़ा आनंद होता है …. |
पत्र
आपने जो यात्रा – वर्णन पढ़ा है, इसे भारतेंदु हरिश्चंद्र ने एक संपादक को पत्र के रूप में लिखकर भेजा था। आप भी अपनी किसी यात्रा के विषय में अपने किसी परिचित को पत्र लिखकर बताइए |














