NCERT Class 8 Mathematics (Hindi Medium - गणित) Solutions
Chapter 3: Understanding Quadrilaterals (Hindi Medium)
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Class 8 Maths Chapter 3 Hindi Medium संख्याओं की कहानी
Class 8 Maths Chapter 3 Question Answer in Hindi
कक्षा 8 गणित अध्याय 3 प्रश्न उत्तर संख्याओं की कहानी
आइए, पता लगाएँ (पृष्ठ 54)
मान लीजिए आप एक संख्या पद्धति का उपयोग कर रहे हैं जिसमें संख्याओं को दर्शाने के लिए छड़ियों का उपयोग किया जाता है जैसा कि विधि 1 में बताया गया है। हिंदू संख्या पद्धति के संख्या नामों या संख्यांकों का उपयोग किए बिना दो संख्याओं या छड़ियों के दो संग्रहों के जोड़, घटाव, गुणन और विभाजन की विधि बताइए।
हल:
जोड़: दोनों समूहों की छड़ियों को मिला लीजिए तथा फिर उनको गिनिए इससे दोनों समूहों की छड़ों का योग (जोड़) प्राप्त होगा।
घटाव : दोनों समूहों की छड़ों को लीजिए तथा एक समूह की छड़ों का दूसरे समूह की छड़ों के साथ एकैकी (एक-एक करके) मिलान कीजिए। तब बड़े समूह की बची मिलान नहीं हुई छड़ों की संख्या दोनों संख्याओं का अंतर बताएगी।
गुणन: एक समूह की छड़ों को उतनी बार गिनिए. जितनी कि दूसरे समूह में छड़ें हैं। गिनी गई अंतिम संख्या दोनों संख्याओं का गुणनफल प्रदान करती है।
विभाजन : छोटे समूह की छड़ों का बड़े समूह की छड़ों से बार-बार मिलान कीजिए। जब बड़े समूह की शेष छड़ें छोटे समूह की छड़ों से कम हो जाएँ तब बची हुई ये छड़ें शेषफल बताती हैं तथा जितनी बार मिलान किया गया है, उसकी संख्या भागफल प्रदान करती है।
विधि 2 में दी गई संख्या पद्धति का विस्तार करने की एक विधि यह है कि एक से अधिक वर्णों वाली श्रृंखला का प्रयोग किया जाए। उदाहरण के लिए हम 27 के लिए ‘aa’ का प्रयोग कर सकते हैं। सभी संख्याओं को दर्शाने के लिए आप इस पद्धति को कैसे विस्तारित कर सकते हैं? ऐसा करने की अनेक विधियाँ हो सकती हैं।
हल:
एक विधि यह हो सकती है कि 28 के लिए- ‘bb’, 29 के लिए ‘cc’, 30 के लिए ‘dd’ इत्यादि का उपयोग करके 52 के लिए ‘zz’ 53 के लिए ‘aaa’, 54 के लिए ‘bbb’, …., 81 के लिए ‘zzz’ इत्यादि उपयोग किया जाए।
आप स्वयं एक संख्या पद्धति बनाने का प्रयास कीजिए।
नोट:
निर्देशानुसार कीजिए।
पाठगत प्रश्न (पृष्ठ 58)
ऐसी संख्या पद्धति का प्रयोग करने में क्या कठिनाइयाँ हो सकती हैं जो मात्र एक ही आकार के समूहों में गणना करती है? आप 1345 जैसी संख्या को उस पद्धति में कैसे निरूपित करेंगे जो मात्र 5 के बार-बार प्रयोग से गणना करती है?
हल:
5 के सभी समूहों को देख पाना कठिन होगा। साथ ही, पाँच-पाँच के समूहों को बनाने के बाद शेष बची वस्तुओं की संख्या की अलग से घोषणा करनी होगी। जहाँ तक 1345 का प्रश्न है, उसे पाँच-पाँच के 269 समूहों में बाँटा जा सकता है तथा 269 पाँच के रूप में गिना जा सकता है।
आइए, पता लगाएँ (पृष्ठ 59)
निम्नलिखित संख्याओं को रोमन पद्धति में दर्शाइए।
(i) 1222
(ii) 2999
(iii) 302
(iv) 715
हम देखते हैं कि यह पद्धति पूर्व में चर्चा की गई कुछ संख्या पद्धतियों की अपेक्षा कितनी अधिक प्रभावशाली है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस पद्धति का उद्भव रोम में लगभग आठवीं शताब्दी सामान्य संवत् पूर्व में प्रचलित प्राचीन यूनानी संख्या पद्धति से हुआ होगा। समय के साथ यह पद्धति विकसित होती गई। रोमन साम्राज्य के विस्तार के साथ यह पूरे यूरोप में फैल गई।
रोमन पद्धति अन्य पद्धतियों की तुलना में दक्ष होते हुए भी अंकगणितीय संक्रियाओं विशेषकर गुणा और भाग को सरलता से करने में इतनी सक्षम नहीं है।
हल:
(i) MCCXXII
(ii) MMCMXCIX
(iii) CCCII
(iv) DCCXV

आइए, पता लगाएँ (पृष्ठ 60)
प्रशांत महासागर के एक द्वीप में रहने वाले मूल निवासियों का एक समूह भिन्न-भिन्न वस्तुओं को गिनने के लिए संख्या नामों के विभिन्न अनुक्रम का प्रयोग करते हैं। वे ऐसा क्यों करते हैं? सोचकर बताइए।
हल:
उन्होंने यह ज्ञात किया होगा कि शरीर के अंगों के उपयोग से गिनना सरल है।
2 के बार-बार प्रयोग से गिनती करने की इसी विधि से गुमुलगल संख्या पद्धति की 6 से आगे की संख्याओं पर विचार कीजिए। इस पद्धति में आने वाली संख्याओं के लिए हिंदू संख्याओं का प्रयोग किए बिना विभिन्न अंकगणितीय संक्रियाएँ (+, -, ×, ÷) करने की विधियों का पता लगाइए।
इसका उपयोग निम्नलिखित का मूल्यांकन करने के लिए कीजिए।
(i) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन) + (उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन)
(ii) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन) – (उकासर-उकासर-उकासर)
(iii) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन) × (उकासर-उकासर)
(iv) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर) ÷ (उकासर-उकासर)
हल:
(i) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन) + (उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन)
= उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर
= 16 है।
(ii) उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन (उकासर-उकासर-उकासर)
= उकासर-उरापोन
= 3 है।
(iii) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन) × (उकासर उकासर)
= उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर
= 36 है।
यहाँ, उकासर × उकासर उकासर उकासर उकासर उकासर और उरापोन × उकासर उकासर है।
(iv) = (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर) ÷ (उकासर-उकासर)
= उकासर-उकासर = 4 है।
(8 उकासर को 4 उकासर के दो समूहों में विभाजित किया गया है।)
हिंदू संख्याओं में,
(i) 9 + 7 = 16
(ii) 9 – 6 = 3
(iii) 9 × 4 = 36,
(iv) 16 ÷ 4 = 4
हिंदू संख्या पद्धति की उन विशेषताओं की पहचान कीजिए जो इसे रोमन संख्या पद्धति की तुलना में अधिक प्रभावी बनाती हैं।
हल:
- यह किसी भी बड़ी संख्या को निरूपित कर सकता है।
- इसमें विभिन्न अंकगणितीय संक्रियाएँ करना सरल है।
इस अनुभाग में चर्चा की गई अवधारणाओं का प्रयोग करते हुए पूर्व में बनी संख्या पद्धति को परिष्कृत करने का प्रयास कीजिए।
हल:
नोट: निर्देशानुसार कीजिए।
आइए, पता लगाएँ (पृष्ठ 62)
निम्नलिखित संख्याओं को मिस्र की संख्या पद्धति में दर्शाइए।
10458, 1023, 2660, 784, 1111, 70707
हल:

ये संख्यांक किन संख्याओं को दर्शाते हैं?
हल:
(i) 276
(ii) 4322

आइए, पता लगाएँ (पृष्ठ 63)
निम्नलिखित संख्याओं को आधार – 5 पद्धति में दिए गए प्रतीकों का प्रयोग करके लिखिए
15, 50, 137, 293, 651
हल:

क्या ऐसी कोई संख्या है जिसे हमारी उपर्युक्त वर्णित आधार-5 पद्धति में नहीं दर्शाया जा सकता? क्यों या क्यों नहीं?
हल:
सैद्धांतिक रूप से, हम इस पद्धति में प्रत्येक संख्या को निरूपित कर सकते हैं। परंतु पाठ्यपुस्तक में दिए केवल 6 प्रतीकों के उपयोग से बड़ी संख्याओं जैसे कि 10000000, इत्यादि को निरूपित करना संभव नहीं होगा।
आधार-7 पद्धति की सांकेतिक संख्याओं का अभिकलन कीजिए। सामान्यतः आधार – पद्धति की सांकेतिक संख्याएँ क्या हैं?
हल:
ये संख्याएँ 70 = 1, 71 = 7, 72 = 49, 73 = 343, 74 = 2401, इत्यादि हैं।
आधार – 12 की पद्धति में ये संख्याएँ 1, n, n2, n3 n4, इत्यादि हैं।
आइए, पता लगाएँ (पृष्ठ 65)
निम्नलिखित मित्र संख्यांकों का योग ज्ञात कीजिए।
हल:


निम्नलिखित संख्यांकों का योग हिंदू संख्या पद्धति द्वारा निर्मित आधार – 5 पद्धति में ज्ञात कीजिए।
स्मरण रखिए इस पद्धति में सांकेतिक संख्या का 5 गुना करने पर अगली सांकेतिक संख्या प्राप्त होती है।
हल:
= 500 + 50 + 15 + 4 = 569 है।



पाठगत प्रश्न (पृष्ठ 66 – 67)
किसी सांकेतिक संख्या को (अर्थात् 10) से गुणा करने पर क्या प्राप्त होता है? निम्नलिखित गुणनफल ज्ञात कीजिए।
हल:
यह अगला प्रतीक ( सांकेतिक संख्या) प्रदान करता है।
प्रत्येक सांकेतिक संख्या 10 की एक घात है तथा इसलिए इसको 10 से गुणा करने पर इसकी घात में 1 की वृद्धि हो जाती है, जो अगली सांकेतिक संख्या है।



किसी सांकेतिक संख्या को (102) से गुणा करने पर क्या प्राप्त होता है? निम्नलिखित गुणनफल ज्ञात कीजिए।
हल:
इसकी अगली सांकेतिक संख्या के बाद की सांकेतिक संख्या प्राप्त होती है:
निम्नलिखित गुणनफल ज्ञात कीजिए।
हल:
(नोट: पाठ्यपुस्तक के आधार पर से आगे कोई प्रतीक नहीं है। इसलिए, यहाँ एक प्रतीक नहीं आ सकता है। इस प्रश्न के इस भाग में कोई गलती है)






गणित चर्चा (पृष्ठ 67)
क्या यह गुणधर्म हमारे द्वारा बनाई गई आधार-5 पद्धति में भी लागू होता है? क्या यह किसी भी आधार वाली संख्या पद्धति पर लागू होता है?
हल:
हाँ, हाँ।
पाठगत प्रश्न (पृष्ठ 68)
निम्नलिखित गुणनफल ज्ञात कीजिए।
हल:


आइए, पता लगाएँ (पृष्ठ 69 – 70)
क्या कोई ऐसी संख्या हो सकती है जिसके मित्र संख्यांक निरूपण में कोई एक प्रतीक 10 या उससे अधिक बार आता हो? क्यों नहीं?
हल:
नहीं, क्योंकि यह एक आधार 10 पद्धति है।
आधार-4 की अपनी स्वयं की संख्या पद्धति बनाइए और 1 से 16 तक की संख्याओं को इसमें निरूपित कीजिए।
हल:
1 = 1, 2 = 2, 3 = 3, 4 = 10, 5 = 11, 6 = 12, 7 = 13, 8 = 20, 9 = 21, 10 = 22, 11 = 23, 12 = 30, 13 = 31, 14 = 32, 15 = 33 और 16 = 100 है।
हमारे द्वारा बनाई गई आधार- 5 पद्धति में किसी दी गई संख्या को 5 से गुणा करने का एक सरल नियम दीजिए।
हल:
संख्या को 5 से गुणा करने के लिए उस संख्या की सांकेतिक संख्या से आधार – 5 पद्धति की अगली सांकेतिक संख्या (प्रतीक) लिखिए।
आइए, पता लगाएँ (पृष्ठ 73)
नीचे दी गई संख्याओं को मेसोपोटामिया की पद्धति में निरूपित कीजिए।
(i) 63 (ii) 132 (iii) 200 (iv) 60 (v) 3605
हम देख सकते हैं कि कैसे मेसोपोटामिया की पद्धति में प्रतीकों को लिखे जाने वाले स्थानों का उपयोग करके सांकेतिक संख्याओं के लिए प्रतीकों के अंतहीन अनुक्रम को बनाने की आवश्यकता को समाप्त कर दिया। ऐसी संख्या पद्धति (जिसमें एक आधार होता है) जो प्रत्येक प्रतीक के स्थान का उपयोग उस सांकेतिक संख्या को निर्धारित करने में करती है जिससे वह संबंधित है, स्थानिक संख्या प्रणाली या स्थानीय मान पद्धति कहलाती है।
स्थानीय मान की धारणा संख्या पद्धतियों के विकास के इतिहास में महत्त्वपूर्ण बिंदु है। इस धारणा ने विभिन्न प्रतीकों को सीमित संख्या में उपयोग करके संख्याओं के अंतहीन क्रम को निरूपित करने की समस्या का एक उत्कृष्ट समाधान दिया।
तथापि मेसोपोटामिया की पद्धति को पूर्णतया विकसित स्थानीय मान पद्धति नहीं माना जा सकता है। इसके साथ ही इसमें कुछ त्रुटियाँ ऐसी हैं जो किसी संख्या को पढ़ते समय भ्रांति उत्पन्न करती हैं।
हल:
नोट: जैसा कि पाठ्यपुस्तक में पहले ही बताया जा चुका है. ये निरूपण भ्रामक हैं।

पाठगत प्रश्न (पृष्ठ 76)
माया संख्या पद्धति का प्रयोग करके दी गई संख्याओं को निरूपित कीजिए।
(i) 77 (ii) 100 (iii) 361 (iv) 721
चूँकि माया सभ्यता एक वास्तविक आधार 20 पद्धति नहीं है। अत: इसमें गणनाओं के लिए किसी आधार वाली पद्धति के समान अनुकूलता की कमी है। तथापि उनके स्थानीय मान संकेत और शून्य के लिए स्थानधारक प्रतीक के प्रयोग को संख्या पद्धतियों के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण उन्नति मानी जाती है।
एक रोचक तथ्य यह है कि हम अभी भी कुछ यूरोपीय भाषाओं के संख्या नामों में आधार-20 का उपयोग देख सकते हैं।
हल:
नोट: यहाँ भी ये निरूपण भ्रामक हैं तथा पाठ्यपुस्तक में उचित रूप से स्पष्ट नहीं किए गए हैं।

आइए, पता लगाएँ (पृष्ठ 80)
आपके विचार से चीन के लोग जोंग और हेंग प्रतीकों को एकांतर रूप से क्यों प्रयोग करते थे? यदि मात्र जोंग प्रतीकों का ही प्रयोग किया जाता तो 41 को कैसे प्रदर्शित किया जाता? यदि दो क्रमिक स्थानों के मध्य कोई सार्थक अंतराल न हो तो क्या इस संख्या की किसी अन्य प्रकार से व्याख्या की जा सकती थी?
हल:
हम सोचते हैं कि चीन के लोग जोंग और हेंग प्रतीकों को एकांतर रूप से इसलिए उपयोग करते थे ताकि इन संख्याओं की व्याख्या स्पष्ट रूप में की जा सके।
केवल जोंग प्रतीकों के प्रयोग से 41 को नीचे दर्शाए अनुसार निरूपित किया जा सकता है:
(41 ऊर्ध्वाधर रेखाएँ)
नहीं। मेसोपोटामिया पद्धति की तुलना में यहाँ रिक्त स्थानों को निर्धारित करना सरल है।

उकासर और उरापोन को अंकों के रूप में लेकर एक आधार – 2 वाली स्थानीय मान पद्धति बनाइए। इस पद्धति की तुलना गुमुलगल पद्धति से कीजिए।
हल:
आधार – 2 वाली स्थानीय मान पद्धति इस प्रकार की हो सकती है:
1 = उरापोन = 1
2 = उकासर = 10
3 = उकासर – उरापोन = 11
4 = उकासर – उकासर = 100
5 = उकासर – उकासर – उरापोन = 101
6 = उकासर – उकासर – उकासर = 110
7 = उकासर – उकासर उकासर उरापोन = 111, इत्यादि। स्पष्टतः, यह गुमुलगल पद्धति से सरल है।
बताइए कि किस प्रकार आपके दैनिक जीवन में और किन व्यवसायों में हिंदू संख्यांक और 0 महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं? यदि हमारी संख्या पद्धति और 0 का आविष्कार या कल्पना नहीं हुई होती तो हमारा जीवन कितना भिन्न होता?
हल:
उस स्थिति में परिकलन करना इतना सरल नहीं होता तथा इससे अनेक क्षेत्रों के विकास में बाधाएँ भी आतीं।
प्राचीन भारतीयों ने हिंदू संख्या पद्धति के लिए संभवत: आधार-10 का उपयोग किया होगा क्योंकि मनुष्य की दस अँगुलियाँ होती हैं और इसीलिए हम अपनी अँगुलियों से गिनती कर सकते हैं। यदि हमारी केवल 8 अँगुलियाँ होती तो क्या होता? तब हम संख्याएँ कैसे लिखते? यदि हम आधार 8 का उपयोग करते तब हिंदू संख्यांक कैसे लिखते?
आधार-5 का उपयोग करने पर हिंदू संख्यांक कैसे लिखे जाते हैं? आधार 10 वाले हिंदू संख्यांक 25 को क्रमशः आधार- 8 और आधार 5 वाले हिंदू संख्यांकों के रूप में लिखने का प्रयास कीजिए। क्या आप इसे आधार -2 में लिख सकते हैं?
हल:
25 = 31 (आधार 8) (3 × 81 + 1)
25 = 100 (आधार 5) (1 × 52 + 0 + 0)
25 = 11001 (आधार 2) (1 × 24 + 1 × 23 + 0 + 0 + 1)

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